Read this Blog\ Read this Blog in english at en.Chitthajagat.in .......स्वर्गवासी......................: 3/1/08

Mar 24, 2008

स्वर्गवासी शब्द को ले कर असमंजस ..!!!!



स्वर्गवासी शब्द को ले कर मेरे सभी जाननेवाले और मित्र असमंजस की स्थिती मै हैं,.....वे सब ये जानना चाहते हैं कि आखिर ये स्वर्गवासी शब्द ही क्यों......स्वर्गवासी शब्द तो अशुभ माना जात है....आपने अपना अस्तित्व रहते ही इसका इस्तेमाल क्यों किया..?????

मित्रो , स्वर्गवासी शब्द इस्तेमाल करना अशुभ हो सकता है...पर.....स्वर्गवासी शब्द अशुभ नही है....!!


स्वर्गवासी शब्द का अर्थ है.....स्वर्ग+वासी= स्वर्ग का वासी, ...मैं अभी जहां हूं या रहता हूं या जिस स्थिती मै हूं....वो कोई स्वर्ग से कम नही है....और कल.. ये सब हो ना हो क्या पता कल मेरे हालात खराब हो जायें... और वेसे भी केहते है ना कि स्वर्ग कहीं है तो धरती पर ही है.....इसलिये हुआ ना मैं स्वर्गवासी...!!!

अगर फिरदौस बार रुई जमीन अस्त,
हमीनस्तो, हमीनस्तो हमीनस्त....!!!

और आखिर मै , सभी से यह निवेदन है कि मेरी आत्मा की शांति के लिये प्राथना करें...!

अभी भी किसी को कोई तकलिफ़ है या अपनी प्रतिक्रिया देना चाहता है तो निशंकोच दे सकता है.....!!!

Mar 20, 2008

होली मुबारक




खाके गुजिया,


पी के भंग


लगा के थोड़ा थोड़ा सा रंग


बजा के ढोलक और मृदंग


खेलें होली हम तेरे संग।


होली मुबारक

ओर्कूट के लिए जुगाड..!!!!


आप को भी खबर मिल गई होगी की ओर्कूट हिन्दुस्तान में ओर्कूट यूज़र्स के लिए नई अप्लिकेशन्स जल्द ही लॉंच ही करने वाला है.. ....और अगर आप इन अप्लिकेशन्स के लॉंच होने तक की वेट नहीं कर सकते तो इन अप्लिकेशन्स का लुत्फ उठाने के लिए एक जुगाड़ बताने जा रहा हूँ..आपको करना सिर्फ़ ये है की अपने ओर्कूट प्रोफाइल को एडिट करें और देश के मेनू में जाकर इंडिया की जगह एसटोनिया(estonia) को सेलेक्ट करें ... अपना प्रोफाइल अपडेट करें और आप नई अप्लिकेशन्स अपने प्रोफाइल में जोड़ने के लिए बाएँ हाथ के कॉलम में बटन देख सकेंगे ,,,!!

Mar 16, 2008

इधर भी गधे हैं, उधर भी गधे हैं..!!!


इधर भी गधे हैं, उधर भी गधे हैं
जिधर देखता हूं, गधे ही गधे हैं

गधे हँस रहे, आदमी रो रहा है
हिन्दोस्तां में ये क्या हो रहा है

जवानी का आलम गधों के लिये है
ये रसिया, ये बालम गधों के लिये है

ये दिल्ली, ये पालम गधों के लिये है
ये संसार सालम गधों के लिये है

पिलाए जा साकी, पिलाए जा डट के
तू विहस्की के मटके पै मटके पै मटके

मैं दुनियां को अब भूलना चाहता हूं
गधों की तरह झूमना चाहता हूं

घोडों को मिलती नहीं घास देखो
गधे खा रहे हैं च्यवनप्राश देखो

यहाँ आदमी की कहां कब बनी है
ये दुनियां गधों के लिये ही बनी है

जो गलियों में डोले वो कच्चा गधा है
जो कोठे पे बोले वो सच्चा गधा है

जो खेतों में दीखे वो फसली गधा है
जो माइक पे चीखे वो असली गधा है

मैं क्या बक गया हूं, ये क्या कह गया हूं
नशे की पिनक में कहां बह गया हूं

मुझे माफ करना मैं भटका हुआ था
वो ठर्रा था, भीतर जो अटका हुआ था